कान्हा

ब्रजमण्डल की भूमि हमारी।
लगती हमको सबसे प्यारी।।

ब्रज माटी में नारायण बालक बनकर खेले थे।
उनकी छवि देखने को गोपियों के मेले थे।।

सारी दुनिया वाले उनको नारायण बतलाते थे।
हमारे ब्रजमण्डल में वो कान्हा कहलाते थे।।

कभी किसी ने छलिया कभी माखन चोर कहा।
कभी जगतगुरु तो कभी रणछोड़ कहा।।

नीति, न्याय, कर्म योग का था सबको संदेश दिया।
युद्ध भूमि में खड़े हो गीता का उपदेश दिया।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
मेल आईडी – ndlodhi2@yahoo.com

ख्वाबों का मंजर

हर पल मन में सपनों का एक नया समंदर होता ।
मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर सा होता ।।

हम रहते हैं इसी धरा पर किंतु चांद पर जाना ।
मेरी आंखों ने देखा फिर से एक ख्वाब पुराना ।।

क्या हम नीले आसमान में पंछी बन उड़ पाएंगे ।
या फिर मेरे सारे ख्वाब अधूरे ही रह जाएंगे ।।

मेरी आंखों ने ख्वाबों का नया जहां अब देखा ।
मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर होता ।।

मेरा मन अब सपनों में हर पल ही तो तपता ।
खूब रोकना चाहू पर मेरा मन कब रूकता ।।

अपने मन को तुम ही बोलो कैसे मैं समझाऊं ।
ख्वाबो के सैलाब को अब कैसे मैं रोक पाऊं ।।

मेरा मन तो हर पल ही सपनों की धुन में खोता ।
मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर होता ।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
ईमेल पता – ndlodhi2@yahoo.com

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यह मेरा हिंदुस्तान

मेरे देश की इस दुनिया में अलग सी पहचान है।
यहाँ सबसे प्यारा सबसे न्यारा मेरा हिंदुस्तान है।।

अनादिकाल से भारत ऋषियों की तपोभूमि रहा।
इतिहासों के पृष्ठों ने भारत को स्वर्ग खग कहा।।

यहां हर बच्चे में राम बसें हर बाला सीता सी।
ऋषियों की वाणी यहां लगती भगवद गीता सी।।

इस धरा पर मेरे देश का एक अलग सम्मान है।
यहाँ सबसे प्यारा सबसे न्यारा मेरा हिंदुस्तान है।।

मेरे देश की इसी धरा पर चंदा सी तरूनायी थी।
मिट गईं वीरांगनायें किंतु आन पर आँच ना आई थी।।

मेरे देश के बालक भी सिंहो से लड़ जाते थे।
सब कुछ खोकर भी क्षत्रिय अपना धर्म निभाते थे।।

मेरे देश की इस मिट्टी के कण-कण में भगवान है।
यहाँ सबसे प्यारा सबसे न्यारा मेरा हिंदुस्तान है।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
ईमेल पता – ndlodhi2@yahoo.com

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मिट्टी

सब कुछ मिट्टी से है जन्मा मिट्टी में ही अंत।
मिट्टी का अस्तित्व, कहानी दोनों ही अनंत।।

जिनसे कांपती थी धरा वह भी मिट्टी में मिल गए।
मिट्टी में बीज के कारत सुगंधित पुष्प खिल गए।।

मिट्टी ने जीवन दिया, जीवन को महकाया।
नए-नए जीवो को मिट्टी ने ही चहकाया।।

मिट्टी ही सर्जन करे मिट्टी से होता विध्वंस।
मिट्टी का अस्तित्व, कहानी दोनों ही अनंत।।

मिट्टी पूर्ण जीवन के सर्जन का आधार बना।
इसी धरा पर मिट्टी से ही जीवन फूला फला।।

मिट्टी कई रूप दिखाएं समय-समय पर प्यारे।
मिट्टी के कईं खेल देखे अलग-अलग व न्यारे।।

जो अपना गुरुर दिखाएं मिट्टी में विलीन तुरंत।
मिट्टी का अस्तित्व, कहानी दोनों ही अनन्त।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
ईमेल पता – ndlodhi2@yahoo.com

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दो पहलू

हर स्थिति के दो विकल्प जो चाहे मैं लेलूं।
जैसे होते है सदा हर सिक्के के दो पहलू।।

अच्छाई, बुराई साथ रहे जैसे पुण्य व पाप।
वैसे ही पथ के दो मार्ग ज्ञात और अज्ञात।।

स्थिर मन के साथ हमेशा चंचल मन भी होता।
जो ज्यादा हंसता दुनिया में सबसे ज्यादा रोता।।

यहाँ भी दो राह है कहलूं या फिर सहलूं।
जैसे होते हैं सदा हर सिक्के के दो पहलू।।

न्याय, अन्याय साथ चले जैसे दिन व रात।
वैसे ही चलता सदा सांझ के साथ प्रभात।।

सत्य असत्य साथ चले जैसे धर्म अधर्म।
वैसे ही पानी के पहलू होते ठण्डा व गर्म।।

दो पहलू फिर से आ गए चलूं या फिर ठहरूं।
जैसे होते हैं हमेशा हर सिक्के के दो पहले।।

नाम – विक्रांत राजपूत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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कलम

कबीर वंशज कहां डरे हैं भूपों की हुंकारों में।
कलम कहां टिक पाती सत्ता के गलियारों में।।

कलम विरोधी रही हमेशा सत्ता के दीवानों की।
कवियों ने कब परवाह की अपने आशियाने की।।

जब जब कलम चली सत्ता संग जनमानस रोया।
उसी समय कवियों ने भी अपना वजूद खोया।।

कवियों को कैसे बांधोंगे के लालच के किरदारों में।
कलम कहां टिक पाती है सत्ता के गलियारों में।।

जब सत्ता मतवाली होती कलम राही दिखलाती।
बड़ा विनाश तभी होता जब कलम मौन हो जाती।।

कवि मन होता बंजारा जिसके पैर कहीं न टिकते।
उन विलासी महलों में कवियों के मन ना रुकते।।

कवियों को कैसे जकड़ोगे डर रूपी हथियारों में।
कलम कहां टिक पाती है सत्ता के गलियारों में।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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मायके के दखल से टूटती ससुराल

छोटा सा एक बना घरौंदा हमने तुमको थमा दिया।
तुमने पीहर की बातों में आकर मंदिर मिटा दिया।।

रिश्ते पहले भी होते थे जीवन भर साथ निभाते थे।
अपंग साथी भी होता था फिर भी स्वीकार जाते थे।।

मेरी मां को मां न समझा बहन संग न तुम रह पायीं।
मेरे घर का एक बोल भी क्यों चुप तुम न सह पायीं।।

यह तो तेरा ही घर था फिर क्यों मोह घटा दिया।
तुमने पीहर की बातों में आकर घर मिटा दिया।।

नैतिकता की बात करो तो ससुराल की आशा तुम हो।
सास-ससुर की बेटी व पति, ननद की अभिलाषा हो।।

पूरे घर ने अपना माना पर तुम अपना न कह पायीं।
जब भी बुरा समय आया साथ खड़ी ना रह पायीं।।

पीहर को अपना माना यह घर मन से हटा दिया।
तुमने पीहर की बातों में आकर घर मिटा दिया।।

सास-ससुर को छोड़ अपनी मां को घर लायीं।
अच्छी बहू न बन सकी आदर्श बेटी कहलाई।।

पति कहीं गर बात न माने बहुत बुरा वो कहलाता।
घर छूटा है उससे पूछो कैसे अपना मन बहलाता।।

मां-बाप की बात मान कर बेटी ने सब बटा दिया।
तुमने पीहर की बातों में आकर घर मिटा दिया।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
ईमेल पता – ndlodhi2@yahoo.com

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स्वतंत्रता सेनानी

भारत मां के लिए दी गयीं कईं वीरो की कुर्बानी।
आजादी की उठा मसाल चले स्वतंत्रता सेनानी।।

अपने जीवन का न लालच दिल में बस अरमान था।
जीवन में जीवन से बढ़कर मातृभूमि सम्मान था।।

बच्चों ने जीवन दे दिया वयस्क जवानी दे गए।
आजादी की कीमत क्या है यह कहानी दे गए।।

कैसे उनका दम घुटता था मिलती कईं निशानी।
आजादी की उठा मशाल चले स्वतंत्रता सेनानी।।

भगत सिंह फांसी पर झूले किंतु कभी हार न मानी।
स्वाभिमान की खातिर मिट गई मण्डला की रानी।।

कईं वीरों ने जान गवाई कईयों ने अस्तित्व खो दिया।
इन वीरों की कुर्बानी ने आजादी का बीज बो दिया।।

वह वीर मिटकर दे गए हमें अनेक नई कहानी।
आजादी की उठा मसाल चले स्वतंत्रता सेनानी।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
ईमेल पता – ndlodhi2@yahoo.com

© स्वरचित रचना एवं
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