गंगापुत्र भीष्म

मेरा क्या दोष रहा जो कुरु वंश के लिए जिया।
कर्तव्यों पर डटा रहा जीवन भर सब त्याग किया।।

शिशु अवस्था में ही मुझको माँ गंगा ने त्याग दिया।
पूरे जीवन भर मैं अलग-थलग सा पडा रहा।।

विधुर, द्रोण थे साथी मेरे कुछ तो अवसर उन्हें मिला।
किंतु भाग्य था मेरा खाली कोई न अवसर मुझे मिला।।

जितने योद्धा लड़े समर में सबका स्वार्थ निहित रहा।
पर दो चक्की के पाटों में दाने सा पिसता ही रहा।।

पितृवचन की खातिर मैंने अपना सब कुछ त्याग किया।
अर्जुन प्रिय मुझे था भारी फिर भी उस पर वार किया।।

नाम – विक्रांत राजपूत
पता – ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
मेल आईडी – ndlodhi2@yahoo.com

गंगापुत्र भीष्म

मेरा क्या दोष रहा जो कुरु वंश के लिए जिया।
कर्तव्यों पर डटा रहा जीवन भर सब त्याग किया।।

शिशु अवस्था में ही मुझको माँ गंगा ने त्याग दिया।
पूरे जीवन भर मैं अलग-थलग सा पडा रहा।।

विधुर, द्रोण थे साथी मेरे कुछ तो अवसर उन्हें मिला।
किंतु भाग्य था मेरा खाली कोई न अवसर मुझे मिला।।

जितने योद्धा लड़े समर में सबका स्वार्थ निहित रहा।
पर दो चक्की के पाटों में दाने सा पिसता ही रहा।।

पितृवचन की खातिर मैंने अपना सब कुछ त्याग किया।
अर्जुन प्रिय मुझे था भारी फिर भी उस पर वार किया।।

नाम – विक्रांत राजपूत
पता – ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
मेल आईडी – ndlodhi2@yahoo.com

कोरोनावायरस

कोरोनावायरस ने बड़ा नाम किया है।
सारी दुनिया को परेशान किया है।।

मुंह पर लगाए सब के मुसीके बैलों की जगह खड़ा इंसान किया है।
जंगली जानवर सैर पर निकले घर में कैद इंसान किया है।।

शीर्षक – कान्हा

ब्रजमण्डल की भूमि हमारी।
लगती हमको सबसे प्यारी।।

ब्रज माटी में नारायण बालक बनकर खेले थे।
उनकी छवि देखने को गोपियों के मेले थे।।

सारी दुनिया वाले उनको नारायण बतलाते थे।
हमारे ब्रजमण्डल में वो कान्हा कहलाते थे।।

कभी किसी ने छलिया कभी माखन चोर कहा।
कभी जगतगुरु तो कभी रणछोड़ कहा।।

नीति, न्याय, कर्म योग का था सबको संदेश दिया।
युद्ध भूमि में खड़े हो गीता का उपदेश दिया।।

नाम – विक्रांत राजपूत
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
मेल आईडी – ndlodhi2@yahoo.com

माँ

आसमां सा कद उसका श्रजन ही पहचान।
वो आभा है मेरे कुल की मेरी उससे है पहचान।।

प्रथम गुरु थी वो मेरी दुनिया की पहचान कराई।
इस जग में मुझको माँ ने अज्ञानता से दी रिहाई।।

एक अनोखी मां की ममता नहीं बराबर उसके कोई।
जब जब पडी़ विपत्ति मुझ पर मुझसे पहले मां है रोई।।

कितने त्याग किए हैं मां ने है मुझको रक्त से सींचा।
इसी वजह से मां का आसन सब देवों में सबसे ऊँचा।।

Vikrant Rajput (Narendra Singh)

Mail id – ndlodhi2@yahoo.com

पगली लड़की

वो एक पगली सी लड़की साथ जो मेरे रहती थी।
दूर से देखा करती थी पर कुछ ना वो कहती थी।।

लगती थी वह चुप-चुप सी अलग हमेशा रहती थी।
दिखती थी वह सहमी सी पर कुछ ना वो कहती थी।।

अक्सर मिलकर रोती थी पर गुमसुम सी रहती थी।
अपने सीधेपन को जटिल हमेशा करती थी।।

अक्सर पूछा करते थे पर कुछ ना बतलाती थी।
अपनी सारी उलझन को वो मन में ही सह जाती थी।।

विक्रांत राजपूत (नरेंद्र)
पता – ग्वालियर

Mail id – ndlodhi2@yahoo.com

अधिकारों के लिए खड़े कर्तव्य नहीं पहचानते हैं।
नैतिकता की मर्यादा को मौन खड़े ही लागते हैं।।

अधिकारों की बात हो संघर्ष खड़ा हो जाता है।
नैतिकता की बात पर जन आधार मौन हो जाता है।।

कर्तव्यों के कारण ही नियमों का पालन होता है।
नैतिकता की ओट में अधिकार चैन से सोता है।।

कर्तव्यों के पालन में संघर्ष बड़ा ही होता है।
नैतिकता की बातों में अधिकार मौन सा होता है।।

पिता

केवल वृक्ष नहीं वटवृक्ष हो तुम।
जिस की शाखा मैं वह वृक्ष हो तुम।।

तुमने कितने नाजों से हमको पाला है।
जब हम टूटे तुम्हीं ने हमें संभाला है।।

जब घर से अकेले निकले थे तब भी तेरा साया था।
जब पड़ी विपत्ति हम पर तब तुम ही ने संभाला था।।

मैं अंशु तुम्हारा हूँ इसको कोई झुठला नहीं सकता।
मैं कभी तुम्हारे इस ऋण को चुका नहीं सकता।।

ndlodhi2@yahoo. Com

गांव में एक किसान डरा सहमा हुआ।
फिर से एक नया जुआ खेलने खड़ा हुआ।।

कुछ पुराने घावों को भूल कर तैयार हुआ।
हाथ उसके कुछ न था फिर भी अड़ा हुआ।।

कुछ दाने बोए उसने धरा की गोद में।
इस विश्वास से मिलेगा कुछ अगले दौर में।।

कुछ समय से मे फसल लहलहाती दिखी जोर की।
और फिर बारिश हुई झमाझम जोर शोर की।।

समय बीतते सारे खेत नष्ट हो गए।
उस किसान के हौसले भी पस्त हो गए।।

साहूकार, कर्जदार घर उसके आने लगे।
उस किसान को दिन प्रतिदिन सताने लगे।।

अपने जीवन की कमाई इस धरा को सौंप चुका।
वह किसान एकदम कंगाल हो चुका।।

उस किसान के लिए बहुत बुरा दौर था।
आत्महत्या के सिवाय कोई विकल्प न और थ।।

नन्हा अंश

ndlodhi2@yahoo.com

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